प्रतिबंध-मुक्तक

क्या हँसना क्या गाना मन का सब बातें बेमानी हैआंखो मे आँसू है नए और दिल मे आह पुरानी हैआज बड़ी खामोशी से मै बात वही फिर कहता हूँतुम चाहो या न चाहो हमको तो प्रीत निभानी है ।किसकी खातिर तुमने यह सुंदर संसार बनाया हैनिज मन का मरुथल भूले और घर आँगन महकाया हैआज तुम्हारा चरणामृत ले जब यह सुमन महकने को हैक्यों इसके संकल्पों पर तुमने प्रतिबंध लगाया है ।जिसको दुनिया ग़म है कहती हम उसके दीवाने हैंआँसू की हर बूंद मे डूबे दिल के कई तराने हैंक्या चांद सितारों की हसरत क्या बातें दौलत शोहरत कीतेरे ग़म की धूप के आगे सब बेमोल फसाने हैं ।मर्यादा की खींच लकीरें जग ने की मनमानी हैजिन आंखो मे तुम थे अब उन आँखों मे पानी है फिरते थे जो मस्त मगन देखो कैसे सहमे से हैंदुनियावालों की जिद है और मुश्किल मे ज़िंदगानी है। …देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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4 Comments

  1. babucm 14/10/2016
  2. Savita Verma 14/10/2016
    • davendra87 20/10/2016
  3. Shishir "Madhukar" 14/10/2016

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