ग़म का दरिया

गम का दरिया धीरे धीरे नस नस मे उतार रहा हूँतुमसे तो मै हारा ही था खुद से भी अब हार रहा हूँ ।लम्हा लम्हा वाकिफ है उन दर्द भरे अल्फ़ाजों से सदियों के पन्नो पर हर पल लिखता तेरा नाम रहा हूँ । फ़ासलों से मेरी नाराजगी यूं ही नहीं है बे-वजहजब मिले साहिल पे तुम मै खड़ा उस पार रहा हूँ ।

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4 Comments

  1. babucm 17/10/2016
  2. Shishir "Madhukar" 17/10/2016
  3. davendra87 17/10/2016
  4. Kajalsoni 17/10/2016

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