गुजारिश है तुझसे….मनिंदर सिंह “मनी”

जरा सी उम्र क्या ढली ?
हर कोई पूछने लगा,
चाय मीठी के फीकी,
खाने में नमक-मिर्च हलकी या तीखी,
रोटी बिना चुपड़ी, या चुपड़ी हो देसी घी से,
पानी ठंडा या ताज़ा, सवालो की इन बौछारों में,
दिल पर क्या बीतती ? कोई पूछे अपने जी से,
कभी हम भी कड़क चाय, मक्खन के पराठे,
मटके वाली छाछ के शौकीन हुआ करते थे,
टूट कर बिखर जाते थे खुद को कहने वाले फौलाद भी,
इतना जोर था कभी हमारी भुजाओ में,
एक टक नज़र से हमें देखने का जनून था,
हर गांव की बालाओ में,
सुनने वाला कोई नहीं, बूढ़ी आँखों में इतने किस्से हो गए,
वक्त नहीं मेरे अपनों के पास, एहतियात देने के सिवा,
क्या किया सारी उम्र ? किसी काम के नहीं,
बातें जितनी मर्जी करवालो,
ऐसे कटाक्ष हम बूढ़ों के जीवन के हिस्से हो गए ?
ऐ “मनी” गुजारिश है तुझसे,
कभी मिले वक्त पूछ लेना हम जैसे बूढ़ों से हाल-ऐ-जिंदगी,
सिवा दुआओ के कुछ नहीं हमारे पास,
बंद कमरे में, चन्द यादों के साथ,
ख्वाहिश है छोटी सी, मुस्कुराती हो मौत से मिले जब जिंदगी |
जरा सी उम्र क्या ढली ?…..

12 Comments

    • mani 25/06/2016
  1. ANAND KUMAR 25/06/2016
    • mani 25/06/2016
  2. babucm 25/06/2016
    • mani 25/06/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 25/06/2016
    • mani 25/06/2016
    • mani 25/06/2016
  4. sarvajit singh 25/06/2016
    • mani 26/06/2016

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