जलते अश़आर

बहुत देर तक जब अंधेरे उठाये,
कहीं तब, ज़रा सी रोशनी में आये।

मुकद्दर का लिखा तो मिलना है मुझको,
मैं चाहता हूँ जो कुछ, कोई तो दिलाये।

कलम में हो स्याही, नहीं कुछ भी मतलब,
उसे जाके कोई, काग़जों से मिलाये।

हैं अश़आर मशहूर फ़लक तक, उसी के,
हों, ग़म दूसरों के भी, जिसने उठाये।

तुम्हारी ही यादों का कैदी हूँ आख़िर,
कहीं मर न जाऊँ, कोई जो छुडाये।

आग पेट की हो या मन की, हवस की,
ख़ुदा आदमी को सभी से बचाये।

लतीफों में, महफ़िल में, जान झोंकी फिर भी,
थे मेहमान बुझदिल, नहीं मुस्कुराये।

एक शब मुझे, मेरे आइने ने घेरा,
ये अश़आर जलते, उसी ने सुनाये।

‘अजेय’ तुमको समझाया सुब्होशाम फिर भी,
कभी शायरी से न तुम बाज आये।

अजय कुमार ‘अजेय’
[email protected]
04.02.2016

9 Comments

  1. babucm 23/06/2016
  2. अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  3. Shishir "Madhukar" 23/06/2016
  4. ajay 23/06/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 23/06/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/06/2016
  7. ajaykajey 27/06/2016

Leave a Reply to ajay Cancel reply