“मिट्टी उठाये घूमता हूँ”_अरुण कुमार तिवारी

‘हाथ में मिट्टी उठाये घूमता हूँ’
_अरुण कुमार तिवारी

हाथ में मिट्टी उठाये घूमता हूँ,
मुझको कतरा इक अदद पहचान दे दो!

हो चली हर शाम धूमिल क्या सितम है,
दफन होने तक तमाशाबीन हँसते|
मौत के दो लफ़्ज जीवन से भी कम हैं!
ज़िन्दगी की राह में संगीन दश्ते|
मौत की चिट्ठी उठाये घूमता हूँ,
मुझको कतरा इक अदद अंजाम दे दो!

हाथ में मिट्टी उठाये घूमता हूँ,
मुझको कतरा इक अदद पहचान दे दो!

करतबे करता किया ता उम्र बे जा,
बे वजा हर वक्त हसरत को सम्हाले|
बह चली बस उम्र रेती बन्द मुट्ठी,
गिर रहे हर तख्त उल्फ़त बन्द ताले|
अपनी ही मुट्ठी उठाये घूमता हूँ!
मुझको कतरा इक अदद ईनाम दे दो!

हाथ में मिट्टी उठाये घूमता हूँ,
मुझको कतरा इक अदद पहचान दे दो!

हसरतें मिटती रहीं बनती रहीं बस खाइयां,
हौसलों के थे घरौंदे पिंजरों की तर्ज़ पे|
आँख के नीचे हमेशा वक्त की थी झाइयाँ,
बे सबब बे वक्त घटते बढ़ चले इक मर्ज़ पे।
चौक में दृष्टि उठाये घूमता हूँ,
मुझको कतरा इक अदद इन्सान दे दो!

हाथ में मिट्टी उठाये घूमता हूँ,
मुझको कतरा इक अदद पहचान दे दो!

-‘अरुण’
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22 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  3. sarvajit singh 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  4. babucm 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  5. RAJEEV GUPTA 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  6. Meena bhardwaj 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  7. आदित्‍य 23/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  8. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/06/2016
  9. अरुण कुमार तिवारी 24/06/2016

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