कोई हैं अपना

बिखरी सी हैं दुनिया पता लगाऊंं कैसे
पुछता ये दिल इस पागल को समझाऊ कैसे

किसने पुकारा ,वहाँ जाऊंं कैसे
होती हैं साजिश मिट जाऊंं कैसे

बाजार सा लगा हैं दिल को बेच आऊंं कैसे
मिलता नहीं वो खरीदार वफ़ा निभाऊंं कैसे

उसने कहा इन्तजार करना, इतना वक्‍त लाऊंं कैसे
मिल गयी मौत “अभि” अब उससे लड जाऊंं कैसे
:-अभिषेक शर्मा

12 Comments

  1. Kajalsoni 21/06/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 21/06/2016
  3. आदित्‍य 21/06/2016
  4. Shishir "Madhukar" 21/06/2016
  5. mani 21/06/2016
  6. sarvajit singh 21/06/2016

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