मन्नू : पंचम अंक

एक रोज दादाजी ने
भेजा लकड़ी तोड़ कर लाने को
क्रिकेट के मैदान पहुंचकर
मन नहीं था जाने को

शाम को लौटे हम दोनों जब
बेशक खाली हाथ
चाची ने पिटाई बचायी
वो थी देती साथ

दादा जी ने हमारा खाना
डाला भैंस के भकोंने मे
उनको करुणा नहीं आती थी
जिद्दी बच्चों के रोने मे

लेकिन मेरी दादी प्यारी
छुपा चुकी थी दूध की प्याली
और चुपके से बोली खालो
वहां पर थी भोजन की थाली

मन गदगद हो जाता है मेरा
औरत का मन कैसा है
चाहे माँ है या भिन्न है रिस्ता
ममता उसमे हमेशा है

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 21/06/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 21/06/2016
  3. babucm 21/06/2016
  4. mani 21/06/2016
  5. arun kumar tiwari 21/06/2016

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