हर चोराहे पर….

हर चोराहे पर मिलने लगे,
कभी जख्मो की नुमाइश कर, कभी बेबसी का रोना सुनाकर,
कभी चेहरे की मासूमियत दिखाकर, भगवान के नाम पर दे दो,
कुछ लोग हाथ आगे करने लगे |
दिल में ख्याल आया, हे भगवान तेरी कैसी ये लीला है,
कितना दर्द समेटे है ?, कैसे खुले आसमान के नीचे लेटे है ?
तन पर कपडा नहीं, ना दवा ना दारु,
कोई दे जाये रोटी दो टूक इसी आस पे बैठे है |
एक आवाज़ ने मेरा ध्यान तोडा और बोली मुझसे,
क्यों पैसे दे पाप कमा रहे हो ? भीख का धंधा क्यों बढ़ा रहे हो ?
क्यों बच्चों के हाथ पैर तुड़वा रहे हो ? क्यों गरीबी का नाटक रचा रहे हो ?
मत खाओ तरस मासूमियत और बेबसी देख,
करोड़ो का टर्न ओवर है इस धंधे में,
बड़ी तेजी से फलफूल रहा दुनिया के इस मंदे में,
बिना किये कर्म, हर कोई रोटी खाना चाहता,
मुफ्त से मिले पैसो से कितनो ने खुद को,
जकड लिया नशे की शिकंजे में
हर चोराहे पर मिलने लगे,

13 Comments

  1. आदित्‍य 20/06/2016
    • mani 20/06/2016
  2. babucm 20/06/2016
    • mani 20/06/2016
    • mani 20/06/2016
  3. Shishir "Madhukar" 20/06/2016
    • mani 20/06/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 20/06/2016
    • mani 21/06/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 21/06/2016
    • mani 21/06/2016

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