वो कौन था परिंदा

वो कौन था परिंदा यहाँ से निकल गय़ा
अपनी कमी का भाव मेरे दिल को दे गय़ा
उसके लिये तड़प की सीमा नहीँ रही
दरियादिली जो थी देखा नहीँ कहीँ
अश्को का वो समंदर बहाकर निकल गय़ा
वो कौन था परिंदा …..

किस्मत का वो धनी था मुझे अब पता चला
हम बेफिक्र मद में वो करता रहा भला
कांटों के बीच खूशबू का समा जला गया
वो कौन था परिंदा …..

शोहरत भी पाई थी वो अपने नसीब से
ग़म इतना सता रहा नहीँ जाना करीब से
अहसास का वो मोती सज़ाकर निकल गया
वो कौन था परिंदा जहाँ से निकल गय़ा.

डॉ.सी.एल.सिंह

12 Comments

  1. sonit 20/06/2016
    • Dr C L Singh 20/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" 20/06/2016
    • Dr C L Singh 20/06/2016
    • Dr C L Singh 20/06/2016
  3. mani 20/06/2016
    • Dr C L Singh 20/06/2016
  4. babucm 20/06/2016
    • Dr C L Singh 20/06/2016
  5. Dr C L Singh 20/06/2016

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