श्रमिकों को समर्पित

उसके मेहनत के पसीने से पलते हैं
और हम कितना बड़ा बनते हैं
कतरा कतरा लगा देता है
अपने हर चाव को चबा लेता है
और फ़िर कैसे हम हँसते हैं
उसके मेहनत के पसीने से ….

उसके एक बूँद का बदला चुकाना मुश्किल है
कांपती रूह को सीने से लगाना मुश्किल है
और उसे कैसे दरकिनार हम करते हैं
उसके मेहनत के पसीने से ….

एक टूकड़ा बड़े नसीब से वो पाता है
श्रम से अपने कलेजा निकाल खाता है
और हम शान से कैसे जीते हैं
उसके मेहनत के पसीने से ….

दबा जाता है वो दिन रात खंडहरों में
पर लगा जाता है चार चाँद सारे शहरों में
और कैसे उसकी मैयत पर
हम खिलते हैं
उसके मेहनत के पसीने से ….

हमारे महलों की चमक बस उसी से होती है
नज़र उठाओ !देखो तो
उसी की आत्मा रोती है
जिगर वो रखता है
और हम जीते हैं

उसके मेहनत के पसीने
से पलते हैं
और हम कितना बड़ा बनते हैं
!
!
डॉ.सी.एल.सिंह

10 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/06/2016
    • Dr Chhote Lal Singh 17/06/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 17/06/2016
    • Dr Chhote Lal Singh 17/06/2016
    • Dr Chhote Lal Singh 17/06/2016
  3. mani 17/06/2016
  4. arun kumar tiwari 18/06/2016
  5. Dr C L Singh 18/06/2016

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