ग़ज़ल

अब रौशनी की तलाश में कहाँ फिरा जाए
मरने की फुरसतें हैं तो अब जी लिया जाए

तुमसे मुहब्बत कर के बहुत परेशाँ रहा हूँ मैं
इसी बात पे आग़ाज़-ए-नफ़रत भी किया जाए

ज़िन्दा होने की सज़ा हर किसी को मिली है
हर दौर में आख़िर ग़मगीं कितना हुआ जाए

हुस्न ने मुझसे बद्सलूकी की भरी महफ़िल में
बताओ तन्हा कर के उसे कैसे तड़पाया जाए

‘आसिम’ इन अश्क़ों को फेंक आ समंदर में
इश्क़ चीज़ है क्या किस किसको समझाया जाए

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 15/06/2016
  2. babucm 16/06/2016
  3. RAJEEV GUPTA 16/06/2016
  4. RAJEEV GUPTA 16/06/2016
  5. mani 16/06/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 16/06/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/06/2016

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