पांच भूर्ण हत्याए

जो बोया वही पाया मैंने,
एक माँ कहती अपने बेटे से,
खुश हु मैँ, फ़िक्र मेरी मत करना,
खुश रहना अपने जीवन में,
दिल अपने पर बोझ मत रखना,
चला था बेटा छोड़ माँ अपनी को,
वृद्धाश्रम की दीवारों में,
जहाँ ना सुननी थी बेटे के पैरो की आहट,
ना होनी थी उसको रोटी देने की चिंता,
ना रही किसी बात की ख्वाहिश,
जान निकलना बाकी था, सूने गलियारों में,
बेटा जाते-जाते बात मेरी सुन जाओ,
मैंने की पांच भूर्ण हत्याए,
तुझको पाने की खातिर,
उसी कर्म की सजा हम है पाए,
सच कहा किसी ने बबूल बीज,
आम कहाँ से खाये ?
जो बोया वही पाया मैंने,
एक माँ कहती अपने बेटे से,

18 Comments

  1. babucm 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
  2. arun kumar tiwari 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
  3. विजय कुमार सिंह 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
  4. Shishir "Madhukar" 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
  6. आदित्‍य 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
  7. RAJEEV GUPTA 15/06/2016
    • mani 15/06/2016
  8. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/06/2016
    • mani 17/06/2016

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