सजा पायी है (गजलनुमा कविता )

क्या कहूँ सच का हाल इस दौर में मित्रों
मैंने अपनों से सच कहने की सजा पायी है

अब तो हद है जुल्मों सितम गरीबों पर
आम को इमली न कहने की सजा पायी है

अब तो जुर्म करने वाले भी बेबाक घूमते हैं
कईयों ने तो जुर्म सहने की सजा पायी है

बक्शा नही प्रभु ने मेरे आलिन्द गिरा दिए
मैंने माँ को बेघर करने की सजा पायी है

टूटा है दिल मेरा आँखों में सिर्फ पानी है
हाँ मैंने इश्क़ करने की सजा पायी है

कैद हैं पिजड़े में, माँ संग नीड में रहने वाले
बस खुले आसमान में उड़ने की सजा पायी है
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महर्षि त्रिपाठी
मोबाइल -9565174319

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 10/06/2016
  2. विजय कुमार सिंह 10/06/2016
  3. C.m. sharma(babbu) 10/06/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 11/06/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/06/2016
    • maharshi tripathi 17/06/2016
    • maharshi tripathi 17/06/2016
  6. mani 17/06/2016

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