नारी “कभी पत्नी कभी माँ”

तेरे पल्लू से अब कच्चे दूध की गंध आती है
तुझे मालूम है मेरे नजर का दोष
और उसमे छिपी ईर्ष्या
शायद इसी लिए तू मुझसे
मेरे बच्चे को आंचल से चुराती है।
मुझे याद है जब तेरी नज़ारे
झुकती थी शर्म हया में
आज भी नजर वहीं है
पर उसे तेरी ममता झुकाती है
दौर वह भी था जब तेरा दिल
तडपता था मेरे एक दीदार के लिए
तू आज भी वहीँ है पर
मासूम की चन्द पलों की
बन्द किलकारी तुझे तडपाती है।
मै बाप बनके भी बाप न बन पाया
अनिर्णीत अनिश्चय में उलझ कर
तू तो साक्षात् देवी, ममता के साथ
पत्नी धर्म आज भी निभाती है।
न जाने क्यों एक अन्जाना भय
घेरे हुए है एक साये की तरह
जिसे कभी मेरी स्वेद महक भी
दूर न कर पाता था
आज वही अनायास बच्चे के पास
खिची चली जाती है!
मै तो आज भी उसी पल में जी रहा
हो वासना के वशीभूत
तू सच्चे अर्थो में नारी!
अपने आचल में दुधमुहे को समेटे
मेरे भी मस्तक पर हाथ फेरती
अपने प्यार को पति बच्चे में
अथेष्ट बाटती है।।।
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सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 10/06/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016
  3. babucm 10/06/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016
  4. विजय कुमार सिंह 10/06/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 10/06/2016
  6. Rajeev Gupta 10/06/2016
  7. MANOJ KUMAR 11/06/2016

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