प्रेम का झरना- शिशिर मधुकर

मन जो ठहरा था तुम पर फ़िर से भटकता फिरता है
मेरे प्रेम का झरना सूखी चट्टानों पर ही क्यों गिरता है
जब तक कोई बाँह फैला मुझे दिल से ना अपनाएगा
मेरे मन की उलझनों को सुकून भी कभी ना आएगा.

शिशिर मधुकर

12 Comments

  1. babucm 10/06/2016
    • Shishir "Madhukar" 10/06/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016
  3. Shishir "Madhukar" 10/06/2016
  4. विजय कुमार सिंह 10/06/2016
  5. Shishir "Madhukar" 10/06/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 10/06/2016
    • Shishir "Madhukar" 10/06/2016
  7. Rajeev Gupta 10/06/2016
  8. Shishir "Madhukar" 10/06/2016
  9. MANOJ KUMAR 11/06/2016
  10. Shishir "Madhukar" 11/06/2016

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