पर्दा

तमाम उम्र पर्दे का शोर उठता रहा,
हुजूर आए भी बेपर्दा और जायेगे भी बेपर्दा ।
बड़ी महीन है बुनियाद इस लिबास की
बाज दफा इक सरसराहट भी मिटा देती है पर्दा ।।
शर्मसार नही हो गर अपनी गुस्ताखियों पे
तो फिर चट्टान होकर भी बेबुनियाद है पर्दा ।
गुजरता हूँ आज भी तेरी ही गली से
कभी आँखों का था पर्दा आज खिड़कियों पे है पर्दा..

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 07/06/2016
  2. babucm 08/06/2016
    • sushil 10/09/2016
  3. Rajeev Gupta 08/06/2016
    • sushil 10/09/2016

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