अल्फाज़

कभी तन्हा, कभी खामोश,
कभी पहेलियाँ सुलझाते अल्फाज़ मेरे,
कभी माँ के आँचल, कभी पिता की झिड़क,
कभी अपनों के प्यार को जिन्दा रखते अल्फाज़ मेरे,
कभी अमीरी-गरीबी के उतार चढ़ाव,
कभी गुजरते हर पल का रखते हिसाब रखते अल्फाज़ मेरे,
कभी रिश्तों की भूख, कभी मसकत दो टुक के लिए,
कभी अपने और गैरो का फर्क समझाते अल्फाज़ मेरे,
कभी उम्मीदों की सुबह, कभी ख्वाहिशो का टूटना,
जिंदगी के हर लम्हे को उकेरते “मनी” के जेहन पर अल्फाज़ मेरे

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" 03/06/2016

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