मन्नू : त्रियोदस अंक

मैं परदेश मैं आया हु
देश मैं जाने की है लगन
यहाँ रोज धुंआ है दिखता
वहां दिखता था स्वच्छ गगन

तारे चंदा यार थे मेरे
और था एक खुशियों का चमन
जब माँ बाप की याद है आती
घबराता है मेरा मन

नाते कोई बिस्मरण न होवे
अक्सर कहते भीगे नयन
जग के बुरे सच को जानकार
गम को करता दिल मैं दफ़न

याद आये आपस मैं झगड़ना
चढ़ जाए मेरे तन पर तपन
जी भर के सेवा नहीं की
अब क्या करे, चाहे कहे मन

परदेश मे कुछ नहीं है मिलता
सब खोकर थोड़ा सा धन
अब जख्मो का ढेर बन हु
घरवाले रो पड़ते थे जब थोड़ा भी दुखता था तन

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 28/05/2016
    • mahendra 29/05/2016
  2. babucm 28/05/2016

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