लफ्ज़ो का खेल

लफ्ज़ो का खेल बड़ा है निराला,
चेहरे पढ़ने बंद कर दिए हमने,
माहिर है हर कोई, बया-ऐ-लफ्ज़ो में,
ना मासूमियत, ना हया, ना झल्लाहट,
ना शंका नज़र आती नज़रो में,
लफ्ज़ो का खेल बड़ा है निराला,
इल्म नहीं किसी को,
कौन,कहाँ,कैसे छलने वाला,
मुमकिन नहीं कोई अपना हो,
आपकी ख़ुशी में मुस्कुराने वाला,
लफ्ज़ो का खेल बड़ा है निराला,
खून के रिश्ते भी तार-तार हो गए,
लफ्ज़ो के इस खेल में,
उच-नीच की भावना नज़र आती है,
इंसानो के मेल में,
लफ्ज़ो का खेल बड़ा है निराला,
ना संतोष का जिक्र, ना प्यार की महक,
ना विश्वाश की मजबूती रही लफ्ज़ो में,
सिवा पछतावे के कुछ और हासिल ना होगा,
जब सिमट कर रह जायेगा ऐ “मनी” कब्रों में,
लफ्ज़ो का खेल बड़ा है निराला,

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 27/05/2016
    • mani 27/05/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 27/05/2016
    • mani 28/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 28/05/2016
    • mani 28/05/2016
  4. babucm 28/05/2016
    • mani 28/05/2016

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