दो गज जमीं और एक कफ़न

यूँ तो मुद्दते गुजार दी मैंने कुछ रिश्ते निभाने में!
जिन्दगी बीता दी यूँहीं चन्द कागज कमाने में!!

कड़ी धुप में चलता रहा बस इस यकीं के साथ!
मै जलूँगा तो रौशनी आएगी मेरे आशियानें में!!

एक ही ख्वाहिस रखी हमने अपनों का दिल न टूटे!
पर अक्सर मेरा दिल टुटा इनके दिलों को सजाने में!!

झंझावातो को हँस कर झेलता रहा चट्टानों की तरह!
वर्ना लोग तिनकों सा बिखर जाते है एक घर बनाने में!!

लहू बेच- कर बड़ी मुफलिसी से जिसको पाला मैंने!
मुझे भूखा छोड़ वह व्यस्त हो गया खुद के कमाने में!!

सच कहा किसी ने नहीं आता मूझे व्यापार करने!
अपनी खुशियाँ बेच दी , अपनों के गम मिटाने में!!

इस जहाँ में खुशिओं का कोई पैमाना नहीं मुकर्रर!
कोई खुश खरीद खिलौना, कोई उसे बिक जाने में!!

कब्रगाह देखकर हँसी आती है, क्यों परेशान था मै!
ना-समझ, मात्र दो गज जमीं लगती है दफ़नाने में!!

तू “कुशक्षत्रप”आया था इस भूल भुलैया में नग्न ही!
शख्सियत खप गयी तेरी बस एक कफ़न कमाने में!!
!
✍सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”✍

17 Comments

  1. babucm 26/05/2016
  2. babucm 26/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 26/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  5. प्रियंका 'अलका' 26/05/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  7. mani 26/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  8. RAJEEV GUPTA 26/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  9. Rinki Raut 26/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  10. निवातियाँ डी. के. 26/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  11. sarvajit singh 27/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 27/05/2016

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