मन्नू: द्वितीय अंक

दादा दादी के पास था रहता
कहानी सुनIदो उनको कहता
नटखट उसके कृत्य निराले
पर थोड़ा उसका नाक था बहता

सन्त्रास पहनकर प्रतिदिन
एक बड़ा कटोरा थाम
चाय दे दो चाय दे दो
कहता था हर शाम

प्रकृति के स्वरुप का उसपर
बड़ा गहरा था प्रभाव
खूबसूरत थी दुनिया कसबे मे
जबकि लौकिक सुखो का अभाव

मन्नू की बाते सभी को भाती
अतिशयोक्ति से उनका जन्म था करता
खूब ठहाके लोग लगाते
निश्छल मन से वाक्य वो भरता

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
    • mahendra 26/05/2016
  2. babucm 26/05/2016

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