वफ़ा का खिताब

ना पूछ मेरे यारा किस कद्र तुमपे प्यार आता है
हमे तेरी नफरत भरी नजर पे भी प्यार आता है

कर लो जितना कर सको नजर अंदाज तुम
तेरी इस अदा पर भी हमे अब नाज आता है

पास आ नहीं सकते हम दूर तुम से जा नहीं सकते
अपनी इस बेबसी पे हमे रह रह के मलाल आता है

आज बनकर रह गए है हम तमाशा–ऐ–बाज़ीगर जमाने में
कभी थे नूर तेरी आँखों का, वो बीता जमाना याद आता है !

ना पूछो अब तुम हाल-ऐ-दिल क्या है, इस तन्हाई में “धर्म” का
कभी नवाजा था वफ़ा के खिताब से, वो लम्हा आज भी याद आता है ।।
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डी. के. निवातियॉ

11 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 26/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/05/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 26/05/2016
  4. sarvajit singh 27/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 27/05/2016
  5. Meena bhardwaj 27/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 27/05/2016
  6. Shishir "Madhukar" 27/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 27/05/2016
  7. babucm 27/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 27/05/2016

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