१९. ये नजरें हैं बेईमान……………………|ग़ज़ल |“मनोज कुमार”

ये नजरें हैं बेईमान तुम्हीं को देखें हैं
छुप छुप के करें इकरार तुम्हीं को देखें हैं

चोरी चोरी मिलना बहुत बातें तुमसे करना
तेरी मुस्कान तेरी तस्वीर तुम्हीं को देखें हैं

ये धूल भरी चिठ्ठियों में अतीत को खोजे है
कर तिरछी नज़र का वार तुम्हीं को देखें हैं

रख्खे हैं किताबों में सभी तूने दिए जो फूल
उन्हें छू कर करे अहसास तुम्हीं को देखें हैं

दुनिया से आँख बचायें फिर बड़ी भोली बन जायें
चंदा जैसा चेहरा उसे बार बार तुम्हीं को देखें हैं

तेरा आचल तेरा गहना तेरे कंगनों का क्या कहना
कभी होठे कभी गालें कभी बालें तुम्हीं को देखें हैं

‘मनोज’ कोई और नही चाहता ना तुमसे दूर रहा जाता
मेरे तुम बस गये मन में करें इज़हार तुम्हीं को देखें हैं

“मनोज कुमार”

6 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/05/2016
  2. MANOJ KUMAR 20/05/2016
  3. babucm 20/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 20/05/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 20/05/2016
  6. MANOJ KUMAR 20/05/2016

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