स्नेह के उपवन – शिशिर मधुकर

पतझड़ तो आए हैं पतझड़ तो आएँगे
मौसम फ़िर बदलेगा गुल खिल जाएँगे
स्नेह के उपवन को जितना भी तोडोगे
सावन के पानी से ये फ़िर फल जाएँगे.

सूरज जो जलता है सागर को खलता है
बिछडे हुए बादल को चैन ना मिलता है
पीडा मिलने की ज्यों ही सीमाएँ तोडेगी
घिर कर ये फ़िर से हम पर ढल जाएँगे

शिशिर मधुकर

18 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 19/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  3. bebak lakshmi 19/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  5. babucm 19/05/2016
  6. Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  7. Meena bhardwaj 19/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  8. निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  9. Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  10. Rajeev Gupta 19/05/2016
  11. Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  12. Kajalsoni 19/05/2016
  13. Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  14. ALKA 19/05/2016
  15. Shishir "Madhukar" 19/05/2016
  16. MANOJ KUMAR 20/05/2016
  17. Shishir "Madhukar" 20/05/2016

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