क्योंकि मैं स्त्री हूं

क्योंकि मैं स्त्री हूं
इसलिए मुझे नहीं
है कोई अधिकार

जन्म से ही अपने
माता पिता के लिए
होती परायी हूँ।
नाज़ों से पाला मुझे
पर अब मुझे ही
अपने से दूर करने की
कवायद में जुटे हैं
घर छोड़ जाना ही होगा मुझको
नहीं इसमें चलेगी मेरी मर्जी
निभाना होगा यह बंधन मुझे
क्योंकि मैं स्त्री हूं।

घर छोड़ आयी मैं अपना
लेकर आयी साथ नए घर में
खुशहाल ज़िन्दगी का सपना।
पर जल्दी ही टूटा भ्रम मेरा
पता चला अब मुझे, नहीं है
मुझे कोई अधिकार
अपनी ज़िन्दगी ही नहीं
जी सकती अपनी मर्जी से
इस पर तो हक़ ही नहीं मेरा
मेरे साथ-साथ आखिर यह
भी तो हो चुकी परायी
मैं ही नहीं हूं अपनी क्योंकि
आखिर मैं एक स्त्री हूं।

सपने टूटे, ख्वाहिशें छूटीं
छूट गया अरमानों का साथ
जब जिसने चाहा
रौंदा मेरे अस्तित्व को
कभी कभी तो मुझ पर
टूटा जुल्मों का कहर।
कह नहीं सकती अपनी पीड़ा
किसी से, क्योंकि यह नहीं
मेरे संस्कार।
चुपचाप सहूं हर अत्याचार
इसी में है मेरी शान
सिखाया गया मुझको
पति परमेश्वर होता है
फिर क्यों वो ही मेरे
अधिकार छीन लेता है
क्या परमेश्वर ऐसा होता है?
या फिर मेरे लिए है परमेश्वर
का यह रूप
क्योंकि मैं स्त्री हूं।

हक़ नहीं मुझे बीमार
होने का या
अपनी ज़िन्दगी में अपने
लिए सपने संजोने का
क्या यूँ ही खामोश बीतेगा
जीवन मेरा
या इसमें भी कभी भर
पाऊँगी मैं कोई रंग?
या बेरंग रह जायेगी मेरी
यह ज़िन्दगी?
क्या स्वेटर बुनते बुनते
बुन पाऊँगी मैं अपने लिए
सुनहरे सपने?
क्या बर्तनों की खनक में
कोई सुनेगा मेरी आवाज़ ?
या सुनकर भी एक बार फिर से
अनसुनी कर दी जाउंगी
क्योंकि मैं स्त्री हूँ।

12 Comments

  1. Rajeev Gupta 18/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" 18/05/2016
  3. bebak lakshmi 18/05/2016
  4. bebak lakshmi 18/05/2016
  5. Kajalsoni 18/05/2016
    • lakshmi 19/05/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/05/2016
    • lakshmi 19/05/2016
  7. C.m. sharma (babbu) 18/05/2016
    • lakshmi 19/05/2016
  8. निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  9. bebak lakshmi 19/05/2016

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