हैरत कि बात क्या …………

हैरत कि बात क्या …………

दिल से दिल गर ना मिले
ऐसे बंधन कि जात क्या
जज्बातो कि न हो कदर
वहां रिश्तों कि बात क्या ।।

लगी जो बात दिल को
उसका फिर इलाज क्या
बनके अजनबी साथ चले
एेसे हमसफर कि बात क्या ।।

नफरत अगर बिठा ली जहन मे
मोहब्बत के असर कि बात क्या
जहा अंधेरा न हो रोशन चॉंद से
उसे कहे कयामत कि रात क्या ।।

मिले भी तो दो किनारो कि तरह
बहते पानी को दरिया बना दिया
रहकर संग भी, सदा तन्हा ही रहे
ऐसे अधूरे मिलन कि बात क्या ।।

रूह का रूह से ना हो वास्ता कोई
जिस्मो के उस संगम कि बात क्या
जब हम – तुम हो एक दूजे से जुदा
दुनिया को एक दिखाने कि बात क्या ।।

दिल से जब उसने अपनाया ही नही
“धरम” शिकवे शिकायत कि बात क्या
वकत पे मिले ना साथ गर अपनो का
दगा दे जमाना तो हैरत कि बात क्या ।।



डी. के. निवातियॉ[email protected]

18 Comments

  1. kamlesh sanjida 18/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  2. Meena bhardwaj 18/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" 18/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  4. Rajeev Gupta 18/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  6. MANOJ KUMAR 18/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  7. C.m. sharma (babbu) 18/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  8. नवल पाल प्रभाकर 19/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 19/05/2016
  9. ALKA 19/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 20/05/2016

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