मेरे परिवार

मेरी श्रीमती जी ने आवाज़ लगाई,
एक पर्ची मेरे हाथ में थमाई,
शाम को आते वक्त, घर का राशन ले आना,
गुड़िया की फीस, बिजली का बिल,
फ़ोन का बिल भी जमा करवा देना,
टूट गया जैसे कोई सपना,
अभी तो देश की चिंताओं में था डूबा,
बाकि रह गया दुनिया का चिंतन करना,
बंद किया अखबार को, दो घुट में चाय पी,
मातपिता से ले आशीर्वाद,
मारी स्कूटर को किक, भीड़-भाड़ से निकल कर,
जैसे पंहुचा काम पर, कितनी सेल करोगे दिन की,
क्या टारगेट है आपका, मुझे दो सेल चाहिए कहीं से भी लाये,
सुनकर दिल बैठ गया, निरुत्तर हो चेहरा जमी में गढ़ गया,
जब ही बॉस के कमरे बाहर निकला,
सहकर्मियों के देख चेहरे पर मुस्कान आई,
बहुत थक गया कह भाई सत्तू से चाय मंगवाई,
होते शाम तक एक पालिसी डिपाजिट करवाई,
तब जाकर जान में जान आई,
फिर निकल पड़ा घर की तरफ,
जेब से निकाली पर्ची, श्रीमती जी ने हमें थी पकड़ाई,
हर सामान के दाम पर नज़र डाली, कर बजट का रख ख्याल,
अच्छे दिन आएंगे किसी ने कहा था, फिर न जाने क्यों बड़े गए भाव,
बढ़ते दामों और गिरती गुणवक्ता पर चिंता जगाई,
ले सारा सामान जैसे पंहुचा घर पर,
नन्ही सी बिटिया मेरी, आकर मुझसे से लिपटी,
माँ पानी ले आई, बाबू जी ने अपने बीते लम्हों की बात सुनाई,
ना जाने कहाँ गुम गयी थकावट, जब हमारी श्रीमती जी मुस्काते हुए,
गरम- गरम सबके लिए खाना परोस के लायी,
थक गए हो ज्यादा लगते आज,
कह प्यार से पलु मेरे मुंह पे डाल दिया,
फिर शुक्र किया मैंने भगवन का मेरे परिवार पर,
ऐसे ही छतर-छाया बनाए रखना,
फिर नयी सुबह की आशा में,
खुद को नींद के आगोश में डाल दिया |

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 17/05/2016
    • mani786inder 18/05/2016
  2. babucm 18/05/2016
    • mani786inder 18/05/2016

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