मुद्द्तें – शिशिर “मधुकर”

मुहब्बत के दुश्मनों के हाथों ये जो खून हुए
जिंदगी में ख़त्म फिर वो सारे मेरे जुनून हुए
तेरी सोहबत की छाँव ज्यों ही इस सर से हटी
ख़ुशी में झूमते मन आँगन फिर से सून हुए.

जिंदगी तप रही थी सूखे रेत की मानिंद जो
तेरी महफ़िल में आकर ही उसे कुछ चैन मिला
स्नेह की बारिश का मुझ पर जो करम हुआ
दिल की बंज़र हुई भूमि में हँसी फूल खिला.

गम और ख़ुशी में मन में जो ख़याल आते हैं
गीत और कहानी बन सफों पर उतर जाते हैं
जिंदगी जाने ये कैसे मोड़ पे मुझको ले आई
खतों किताब से गायब वो सभी मज़मून हुए .

जिंदगी है तो परेशानियाँ भी यहाँ पर आऍंगी
कुछ चोटें मगर नासूर बन कर सदा सताएंगी
मेरे अपनों ने दिए घावों को कुछ ऐसा छेड़ा है
अब तो मुद्द्तें हो गई है मुझको वो सुकून हुए .

शिशिर “मधुकर”

20 Comments

  1. babucm 17/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" 17/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 17/05/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 17/05/2016
  6. Shishir "Madhukar" 17/05/2016
  7. Rajeev Gupta 17/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 17/05/2016
  8. mani786inder 17/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 17/05/2016
      • mani 20/05/2016
  9. Kajalsoni 17/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 17/05/2016
  10. sarvajit singh 17/05/2016
  11. Shishir "Madhukar" 18/05/2016
  12. MANOJ KUMAR 18/05/2016
  13. Shishir "Madhukar" 18/05/2016
  14. Meena bhardwaj 18/05/2016
  15. Shishir "Madhukar" 18/05/2016

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