किसान

बोल रे मन!
ये कैसी दुनिया,
जिसका उपजा खाते
वही तिरस्कृत रहते।
जल-जल जिसका लहू,
तप-तप पसीना बनता,
धरा के ह्रदय को चीर-चीर,
अपनी उम्मीदें बोता,
पर न दुख को खोता,
न सुख को पाता।।

थक-हार समेटे
अपनी हड्डियाँ,
जब ढनढनाता
खाली हंडिया,
कोने में दुबकी
भूखी परछाईयाँ,
देख उसे
भरती सिसकियाँ ।

आसा-निरासा से
लड़ता-भिड़ता,
उस पल हीं वो
टूट है जाता,
मिटते-मिटते
कैसे न मिटता,
भूखी तम से ,
बढ़ती ॠण से,
आखिर कब तक जूझता ।।

जब धरा से उपजी
फसल तड़पती,
तब धरा की बनी
एक नसल सिकुड़ती।
और हम………
हम क्या करते???
सूरज,चंदा,
तारे,मोती,
इनको हीं अलंकृत करते,
सघन तम की
भूखी रेखा,
देख-देख
अनदेखा करते ।।

सुन रे मन!
हाँ हम यही है करते ।

सारी पीड़ा वो पीते,
पंक्तियों को गढ़-गढ़,
वाह-वाही हम लूटते,
हाथ तो है कलम चलाती,
ह्रदय शर्म -शर्म में डूबी,
खुद से हीं है
नजर चुराती ।।

अलका

14 Comments

  1. C.m. sharma (babu) 15/05/2016
    • ALKA 15/05/2016
  2. Jay Kumar 15/05/2016
    • ALKA 15/05/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 15/05/2016
    • ALKA 15/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 15/05/2016
    • ALKA 15/05/2016
  5. Meena bhardwaj 16/05/2016
    • ALKA 17/05/2016
  6. Rajeev Gupta 16/05/2016
    • ALKA 17/05/2016
  7. निवातियाँ डी. के. 16/05/2016
    • ALKA 17/05/2016

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