हिसाब…

तमाम उम्र का था हिसाब हमारा,
पलो में क्यों मुका (खत्म) गए?
लाखों का बता,
कोड़ियो का दाम क्यों लगा गए?
कहते थे तुम परछाई हमारी,
फिर अंधेरो में क्यों छुपा गए ?
कभी थे हम उनके हर सवाल का जवाब,
बुझारतो में क्यों उलझा गए?
मंगाते थे जो जीत की दुआए हमारी,
मात कैसे हमें दे गए ?
शायद परवरिश में कमी,
या वक्त का था हेर फेर,
जो उम्र भर का दर्द,
“मनी” के दामन में डाल गए |

10 Comments

  1. mani786inder 14/05/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/05/2016
  3. mani786inder 14/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 14/05/2016
    • mani786inder 14/05/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 14/05/2016
    • mani786inder 14/05/2016
  6. C.m. sharma (babu) 15/05/2016
    • mani786inder 15/05/2016

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