आज़ादी की दास्ताँ…….

आज़ादी की दास्ताँ…….

क्या यही सोचकर वीरो तुमने
हिँद वतन आज़ाद किया
कि अपने ही लूटेँ हिँद धरा को
अपने ही लूटेँ हिँद वतन
अपनोँ के ही कदमोँ तले
ये मसले जाएँ ध्वज सुमन
क्या यही……

खाईँ गोलियाँ अंग्रेजोँ की
असंख्य अत्याचार किए सहन
अपनोँ की लगाई आग मेँ ही
आज जल रहा है हिँद चमन
क्या यही…….

आधा पेट ही भोजन खाया
न्योँछावर किया अपना तन मन
ताकि जनता रहे स्वस्थ
आबाद रहे हर घर आंगन
क्या यही सोचकर वीरो तुमने
हिँद वतन आबाद किया
कि अपने…….

आधी जनता रहे त्रस्त
आधी पाए आराम प्रबंध
आधी जनता रहे अशिक्षित
आधी पाए ज्ञान तपन
सत्ता मेँ जो बैठे हैँ
वही लूट रहे अपना चमन
क्या यही सोचकर वीरो तुमने
अपना सर्वस्व बलिदान किया
कि अपने ही लूटेँ हिँद धरा को
अपने ही लूटेँ हिँद वतन
अपनोँ के ही कदमोँ तले
ये मसले जाएँ ध्वज सुमन
क्या यही…………………IMG432 (3)

5 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/05/2016
    • Yugal Pathak 29/05/2016
  2. babucm 24/05/2016
  3. mani 24/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 24/05/2016

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