मर्ज़ (नज़्म)

ना जाने क्या करते रहते हो
क्यूँ इतना भी नहीं समझते हो
अब कुछ नहीं हो सकता
सजदे में चाहे सर लाख झुकाओ
क़लमा पढ़ो कि दुआयें पाओ
आईने सा दिल रख लो मग़र
अब कुछ नहीं हो सकता
किससे अपनी उलझन कहोगे
धडकनों का शोर किसको सुनाओगे
मर्ज़ क्या बताओगे किसी को अपना
चारागर को क्या समझाओगे
कुछ भी बोलो ज़माने से
चेहरा शर्म से पानी होगा
पलकें जब झुक जायेंगी
क्या तब तुम्हें यकीं होगा
के अब कुछ नहीं हो सकता
लबों पर बर्फ़ जमी है जो
कहो उसे कौन अब पिघलाए
भूख से नींद से चैन से सुकूँ से
जो हाथ धो बैठे हो,कहो
किस को अब कोई क्या बतलाये
दीवारों पर सर मत पीटो
के बड़ी मुख़्तसर सी बात है ‘आसिम’
जो जानलेवा रोग लगा है तुझे
उस मर्ज़ का नाम मुहब्बत है
अंजाम औ हश्र सोचना क्या है
अब कुछ नहीं हो सकता।

मायने- सजदा-ईश्वर के आगे नतमस्तक,चारागर-वैद्य,मुख़्तसर-संक्षिप्त

8 Comments

  1. mani786inder 12/05/2016
  2. आभा 12/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" 12/05/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 12/05/2016
  5. आभा 12/05/2016
  6. babucm 13/05/2016
  7. आभा 13/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/05/2016

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