जन्नत – शिशिर मधुकर

ईश्वर के अर्धनारीश्वर रूप को समक्ष रखते हुए. नारी के लिए पुरुष के मन के कुछ भावों को मैंने शब्द देने की कोशिश की है. मेरी अर्धांगिनी को समर्पित.

पारस को छूने से ज्यों लोहा कंचन बन जाता है
तेरे सीने से लगकर तन मन मेरा खिल जाता हैं
जब जब तू मेरे चेहरे को हाथों में अपने भरती है
तेरी आँखों की मय मुझको मदहोश सा करती है
तेरी सांसों की गर्मी जब मेरे माथे से टकराती हैं
मेरी सारी शक्ति तब तेरे कदमो में झुक जाती है
तेरे गेसू जलते तन पर कुछ ऐसा जादू करते हैं
जैसे शोलों पर नाजुक से हरसिंगार बिखरते हैं
प्रेम अगर ना हो जीवन में हर शै यहाँ अधूरी है
असली दीवानों के दामन में होती जन्नत पूरी है

शिशिर मधुकर

8 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 09/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" 09/05/2016
  3. babucm 09/05/2016
  4. Shishir "Madhukar" 09/05/2016
  5. sarvajit singh 09/05/2016
  6. Shishir "Madhukar" 09/05/2016
  7. MANOJ KUMAR 11/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 12/05/2016

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