तुम्हारी बात मुझसे….

(यह रचना मेरी पहली रचना “बात सिर्फ तुमसे” के प्रतिउत्तर रूप में है….”बात सिर्फ तुमसे http://www.hindisahitya.org/70263″ भी पढियेगा…)

तुमको हम तुमसे मिलाएं तो मिलाएं कैसे….
राज़-ऐ-दिल तुमसे सुनें..तुमको सुनाएं कैसे….

मेरा जुर्म उल्फत है…तेरा अहद-ऐ-वफ़ा….
मेरी तकदीर को तेरी से मिलाएं कैसे….

कौन जीता है कौन मरता किसी की खातिर…
ऐसा होता तो खुदा हमको…बनाये कैसे….

तुम तो इक बार ही देखे हो…इश्क़ का मरना…
ज़िन्दगी खुद हो जनाज़ा जो..रोज़ उठाएं कैसे…

दर्द दिल..रूह के अश्कों से निकल आते हैं…
अश्क़ आग और बढ़ा दें…तो बुझाएं कैसे….

ना तो अब ईद मेरी कोई….ना ही दिवाली है….
दिल जो हर पल ही सजा दे तो मनाएं कैसे…

ज़िन्दगी बदहवास सी बिखरी पड़ी है रेत पे ‘बब्बू’…..
अज़ादार खुद ही का..किसी औरको डुबाए कैसे…
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/सी.एम. शर्मा (बब्बू)

6 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 05/05/2016
    • babucm 06/05/2016
  2. Kajalsoni 05/05/2016
    • babucm 06/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" 05/05/2016
    • babucm 06/05/2016

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