मन का बंधन

बहुत हुआ सर झुका के बंदन
अब खोल सारे मन के बंधन

कुंठित था तेरा मन सदा से
अब तो सुलझा ये उलझे धागे

सांस सांस में घटता जीवन
राम नाम से कर सिंचित उपवन

मिटा अभिलाषा का अपूर्ण भ्रमण
राम समक्ष कर पूर्ण समर्पण

लेखा जोखा लाभ और हानि
भ्रमित करती मन की मनमानी

करता चल अब भला दूसरों का
मिटेगा विषाद जो था बरसों का

भीतर के इंसान को जगा
मन से दूषित तम को भगा

औरों को भी जगा तू जागकर
बूँद बूँद से बनता सागर

साकार निर्विकार कोई भी मूरत
दिल में बसा तू सांवली सूरत

नव प्रभात की है सुन्दर बेला
बांध गठरी और चल अकेला

चलता चल, नहीं विश्राम का ये काल
अंतकाल कट जायेगा ये मायाजाल

हितेश

4 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 04/05/2016
    • Hitesh Kumar Sharma 04/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" 04/05/2016
    • Hitesh Kumar Sharma 04/05/2016

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