पत्थर मज़ार का – शिशिर मधुकर

देखकर जिनको दिखे ना कोई भी अपने आस पास
ऐसे चेहरे जिंदगी में बन जाते हैं कुछ इतने ख़ास
मिल जाए अगर मौक़ा हमें उनके सदा दीदार का
तब ही तो असली लुत्फ़ आएगा खुदाया प्यार का.

हमने तो कोशिश खूब की तेरे महल में सजने की
पर ना दी तूने इज़ाज़त हमें रूह में अपने बसने की
जीते जी हमको अगर दामन से कुछ भी ना दे सको
कम से कम पत्थर बना लेना हमें अपनी मज़ार का

सोचा था चाँद तारों से सजाएँगे हम उसका बदन
काँटों पर कभी पड़ने न देंगे उसके नाज़ुक से कदम
क्या पता था अंत ना होगा इस लम्बे इंतज़ार का
अब क्या करें बिखरी पड़ी इस दौलत बेशुमार का.

शिशिर मधुकर

12 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 04/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 04/05/2016
  2. Hitesh Kumar Sharma 04/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" 04/05/2016
  4. sarvajit singh 04/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 05/05/2016
  5. Swati naithani 05/05/2016
  6. Shishir "Madhukar" 05/05/2016
  7. mani786inder 13/05/2016
  8. Shishir "Madhukar" 13/05/2016
  9. babucm 26/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 26/05/2016

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