यादो के झुरमुट ………..

यादो के झुरमुट से
आज अनायस ही
निकल पड़ी,
एक धुंधली सी परछाई
सिमटे हुए थे
उसकी पनाह में
प्रेम के गर्द की धुंध में सने
सुकून के
वो लम्हे जो भूल गया था
वक़्त के साथ
कदम ताल मिलाने
के आवेश में
अकेले में फिर से
आज मुलाक़ात हो गई
बरबस छलक पड़े
नयनो से अश्रु
निहारा जब उसने अपनेपन की
चाहत भरी नजरो से
जुदाई का अहसास कराते हुए
मिलन की तड़प लिए
अनुभूति हुई मुझे
सब कुछ पाने की चाह में
क्या गँवा बैठा
और आज फिर खड़ा हूँ
उसी मोड़ पर
जंहा से चला था अकेला
आज फिर अकेला हूँ
यादो के झुरमुट में
लिपटे लम्हों के साथ
जो आज भी दे रहे है मुझे
जीने का सहारा
और एक सबक भी
सुकून नहीं है इस भौतिक
संसाधनों के ढेर में
वो तो आज भी
मिलता है ह्रदय के
उस कोने में जिसे कभी
टटोलने की कोशिश ही नहीं करता
ये इंसान !!
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!
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डी. के. निवातियाँ [email protected]

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 03/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 03/05/2016
  2. babucm 03/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 03/05/2016
  3. Meena bhardwaj 03/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 03/05/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 04/05/2016
  5. sarvajit singh 03/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 04/05/2016
  6. dushyant patel 04/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 04/05/2016
  7. MANOJ KUMAR 07/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 07/05/2016

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