घृणा – शिशिर मधुकर

मेरी चाहत में ही कमी थी जो तुम दूर हो गए
तन्हा होकर खुद मेरी तरह ही मज़बूर हो गए
ख़ुशी दूजों की इस ज़माने को ना रास आई है
घृणा ने सदियों से प्रेम नगरों में की तबाही है

शिशिर मधुकर

11 Comments

  1. Rajeev Gupta 16/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 16/05/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 16/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" 16/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/05/2016
      • Shishir "Madhukar" 17/05/2016
  4. sarvajit singh 16/05/2016
    • sarvajit singh 16/05/2016
  5. Shishir "Madhukar" 17/05/2016
  6. babucm 17/05/2016
    • Shishir "Madhukar" 17/05/2016

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