आज फिर……

सुनहरी किरनों को
पंकिल होते देखा है,
इंद्रधनुष के रंगों को
बोझिल होते देखा है,
चंदा की चाँदनी को
खुद में सिमटते देखा है,
सुरीले रागों को
बेसुरा बन
बिखरते देखा है,
आज फिर,
मानवता को मरते देखा है ।

पूराने कपड़ों के बदले
कूपन को कटते देखा है,
गरीब के चिथड़ो को
और सिकुड़ते देखा है,
द्वार पर आई बूढ़ी अम्मा को
फटकार खाते देखा है,
भर-भर थाल अनाजों को
कूड़े में जाते देखा है,
आज फिर,
मानवता को मरते देखा है ।।

नन्हें हाथों से बिकते गुब्बारो को
उनके हाथों में हीं
अटके देखा है,
उनकी शांत लाल दृगो को
पीड़ा से तड़पते देखा है,
गरीब की गरीबी को
दिन -रात सिसकते देखा है,
दिखावे के नाम पर
पैसे को उड़ते देखा है,
आज फिर,
मानवता को मरते देखा है ।

किसी के कलम को
राजनीति गढ़ते देखा है,
धर्मों के नाम पर
आग उगलते देखा है,
करूणा और प्रेम को
ह्रदय में हीं घुटते देखा है,
लेखनी को भी
नफरत में फंसते देखा है,
आज फिर,
मानवता को मरते देखा है ।।

सदियों से खड़े वृक्ष को भी
पहचान खोते देखा है,
विशाल समुद्र के लहरों को
सबकुछ लूटते देखा है,
दूध से भरी कटोरी को भी
छल करते देखा है,
प्रतिमा में छिपे ईश्वर को भी
छुप-छुप रोते देखा है,
हाँ आज फिर,
मानवता को मरते देखा है ।

अलका

15 Comments

  1. babucm 26/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 26/04/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 26/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 26/04/2016
  3. Jay Kumar 26/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 26/04/2016
  4. Shishir "Madhukar" 26/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 27/04/2016
  5. MANOJ KUMAR 27/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 27/04/2016
  6. rachana 27/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 27/04/2016
  7. Meena bhardwaj 27/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 27/04/2016
  8. kiran kapur gulati 05/08/2016

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