सामाजिक सत्य

सब कुछ असहज सा लगता है, अपना अक्स भी गैर सा लगता है,
जब खो जाता हूँ दुनिया की कश्मकश में, हर एक से बैर सा लगता है।
जली कटी ये बातें सबकी, हैं ऊँचे नीचे विभिन्न विचार,
कभी बैठकर सोचूं तो, ये जालिमों का शहर-सा लगता है।।

खुशमिज़ाज लोग भी बचते नहीं, ऐसे बे-आबरू लोग होते हैं,
सीने को चीर देते हैं, कुछ ऐसा कटु बोल देते हैं।
किनारा कोई प्यार का नहीं, स्वार्थ में लोग रहते हैं,
दुःखी वो ही लोग होते हैं, जो दिलों को खोल देते हैं।।

अरुण जी अग्रवाल

7 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 26/04/2016
  2. babucm 26/04/2016
  3. babucm 26/04/2016
  4. Shishir "Madhukar" 26/04/2016
  5. अरुण जी अग्रवाल 26/04/2016
  6. MANOJ KUMAR 27/04/2016
  7. अरुण जी अग्रवाल 27/04/2016

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