उलझन…..

तेरे मन कि तेरे मन मे,
मेरे मन कि मेरे मन मे,
कैसे कहे मन कि वयथा
दोनो रहते उलझन मे ।।

फ़ासलो के रथ पर बैठ
मंजिले कब हासिल होती
कूप के किनारे पर बैठ
प्यास कब ख़त्म होती ।।

कुछ बंदिशो को तुम तोडो
कुछ दूरियाे को हम मिटाये
लगाकर पंख अरमानो के
प्रेम गगन मे हम उड जाये ।।
!
!
!
डी. के. निवातियाँ [email protected]

18 Comments

  1. प्रियंका 'अलका' 30/04/2016
    • निवातियाँ डी. के. 30/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" 30/04/2016
    • निवातियाँ डी. के. 30/04/2016
  3. sarvajit singh 30/04/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/05/2016
  4. MANOJ KUMAR 01/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/05/2016
  5. Meena bhardwaj 01/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/05/2016
  6. Archana mehta 01/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/05/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/05/2016
  8. Er. Anuj Tiwari"Indwar" 02/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 02/05/2016
  9. babucm 02/05/2016
    • निवातियाँ डी. के. 02/05/2016

Leave a Reply