सिमटन

मैं जानती हूँ,
कभी -कभी मैं
तुम्हें बहुत पीड़ा देती हूँ ,
तुम्हारे ह्रदय पर
गहरी चोट करती हूँ ।
पत्थर सी अपनी
कठोर वाणी से,
तुम्हारे मन की लहरों को,
धकेल-धकेल हटाती हूँ।।
समुद्र रूपी तुम्हारे ह्रदय को
झूठला कर,
तुम्हारे असीम स्नेह को,
मैं तीव्र गति से उफनते हुए,
उन्हें बेजान कर,
गर्म रेत पर
फैला देती हूँ ।

एक पल जब तुम
ठगे से रह जाते हो,
दूजे पल मैं भी
ठगी सी रह जाती हूँ,
जब अपनी वेदनाओं को
समेटने में,
खुद को असहाय पाती हूँ ।।

एक डोर से बंधी है
हमारी ज़िन्दगी,
तुम हो सबल,
और मैं भी नहीं
कमजोर कड़ी ।
पर शायद तुम्हें
ज्ञात नहीं,
तुमने जब -जब
मुझे समेटा
मेरा अस्तित्व संभला नहीं ,
और है सिमटा ।।

अपने सपनों को छोड़
जब तुम्हारे सपनों को
जीती हूँ,
सच,
एक तीव्र पीड़ा से
लड़ती हूँ ।
जब अपनी छोटी -छोटी
खुशियों में,
तुमको ढूँढ़ न पाती हूँ,
तुम्हारे बटे हुये
समय से,
जब खुद को
हारता पाती हूँ,
सच,
तुम्हारे प्रेम को
छलावा मात्र पाती हूँ,
और उसी छन,
धधकती ज्वाला बन,
तुम्हें जला जाती हूँ ।

पर अब भी जीवित हैं,
एक दृग तुम्हारे सजल,
एक दृग मेरे सजल,
एक प्रेम तुम्हारा प्रबल,
एक प्रेम मेरा प्रबल ।।
तो चलो,
हम दोनों जाये संभल।
एक खामोशी तुम तोड़ो,
एक चुपी मैं बाँधुगीं,
एक कर तुम अपना खोलो,
एक सिमटन
मैं अपना तोड़ूगीं।।

. अलका

9 Comments

  1. babucm 22/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 22/04/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 22/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 22/04/2016
  3. Shishir "Madhukar" 23/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 23/04/2016
  4. sarvesh 24/04/2016
  5. sarvesh 24/04/2016
  6. संदीप कुमार सिंह 26/04/2016

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