“बीती बातें “

कुछ कहना ,कुछ सुनना;
अब बीतें दिनों की बातें हैं ।
अनजानी सी,अनदेखी सी;
डोर का धागा,अब टूट सा गया है ।।
तेरे सपने, तेरे अपने;
दुनियादारी और समझबूझ की बातें ।
तुम को ‘तुम सा’
बनने से दूर करती हैं ।।
तेरे मेरे बीच का अपनापन,
जैसे एक नदी के दो पाट ;
रहें साथ ,चलें साथ ।
लेकिन पाटों का अलगाव,
कुछ सोचने को मजबूर करता है ।।
तेरी समझदारी की लहरों के बीच,
मेरी नादानियों का निर्झर सूख सा गया है ।
दुनियादारी की भीड़ के बीच,
अपनेपन का एक भीगा सा कोना
कहीं छूट सा गया है ।।

“मीना भारद्वाज”

11 Comments

  1. babucm 18/04/2016
  2. Meena bhardwaj 18/04/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 18/04/2016
  4. Meena bhardwaj 18/04/2016
  5. Rituraj191 19/04/2016
    • Meena bhardwaj 19/04/2016
  6. Shishir "Madhukar" 19/04/2016
    • Meena bhardwaj 19/04/2016
    • babucm 19/04/2016
  7. Shishir "Madhukar" 19/04/2016
  8. Meena bhardwaj 19/04/2016

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