चेहरे पे चेहरा

अपने चेहरे पे चेहरा लगाए बैठा हूँ…
हस्ती अपनी है नहीं फिर भी सौगात लिए बैठा हूँ…

तूफ़ान उठते ही कश्ती समंदर में उतार लेता हूँ….
शायद लहर कोई आगोश में लेले… ऐसी आस लगाए बैठा हूँ…

क्या पता कब चाँद निकल आये बादल के आँचल से….
रात अमावस में भी मैं टिकटिकी लगाए बैठा हूँ….

सजा खुद ही मुकरर कर ली हमने तुझको दर्द देने की….
हलाल होने को गर्दन पे नश्तर लगाए बैठा हूँ…

अपना तो नसीब ही इस कदर खुशनुमा है ‘बब्बू’…
के हंसी अपने चेहरे पे….हर चेहरे की लगाए बैठा हूँ….

-oOo-
/सी. एम. शर्मा (बब्बू)

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 19/04/2016
    • babucm 19/04/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 19/04/2016
    • babucm 19/04/2016

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