इकरार ऐ मोहब्बत (ग़ज़ल)

न इस में हाँ होती है न इस में ना होती है
मोहब्बत तो जज़्बातों से बयां होती है

तमाम उम्र तेरा इंतज़ार कैसे करें
सब्र की भी तो कोई इंतहां होती है

समझूंगा कि मेरी वफ़ा का सिला मिला मुझे
इकरार ऐ मोहब्बत में अगर तेरी हाँ होती है

उम्मीदों का चिराग जलाए बैठा हूँ
नहीं रोज़ दिल की दुनिया जवां होती है

महताब बनकर तुम आ जाओ जिंदगी में
चांदनी तो रात भर की मेहमान होती है

है उम्मीद कि जीत इक रोज़ होगी मोहब्बत की
तक़दीर अगर मुझ पर मेहरबान होती है

ये तो दिल का सारा खेल है हितेश
अक्ल की इस में सुनवाई कहाँ होती है

6 Comments

  1. Vimal Kumar Shukla 14/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" 14/04/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 16/04/2016
  4. Hitesh Kumar Sharma 18/04/2016
  5. babucm 18/04/2016
  6. Saviakna 19/04/2016

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