रोती ममता

ठंड की रात में,
चिथड़ो में लिपटी,
माँगते -माँगते भीख,
सड़क के किनारे
आज फिर एक बच्ची सोई है ।
आज फिर एक ममता रोई है ।।

चमचमाते मॉलो के बाहर
धूल में लिपटे
अलकों के पीछे
भूख से व्याकुल
इच्छुक आँखें
आज फिर भूखी हीं सोई है ।
आज फिर एक ममता रोई है ।।

क्या मंदिर
क्या मस्जिद
पाट कर इनके भेद
द्वार पर इनके
दया के लिए खड़ी
आज फिर एक परछाई है,
फैली हाथो में माँगती,
दया की दुहाई है,
आज फिर एक ममता रोई है ।।

सूखी रोटी के लिए ,
आज फिर एक बचपन,
कुत्तों से काटी-नोंची गई है,
सूखी रोटी
उसकी खून सी हो गई है,
आज फिर एक ममता रोई है ।

आज रात भी अँधेरे से
डर-डर कर सोई है ,
तारों ने भी छिप कर
अम्बर की बढ़ाई तन्हाई है,
धरा भी विछोह में सिमट
खुद को ढूढ़ न पाई है,
हाँ! आज फिर एक ममता,
चीख-चीख कर,
फूट-फूट कर,
बेबस,बेजान शव से
लिपट -लिपट कर रोई है,
आज फिर एक ममता रोई है ।।

अलका

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 12/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 13/04/2016
  2. babucm 12/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 13/04/2016
  3. Er. Anuj Tiwari"Indwar" 13/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 13/04/2016
  4. Jay Kumar 13/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 13/04/2016
  5. Hemchandra 13/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 13/04/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 13/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 13/04/2016
  7. sarvajit singh 14/04/2016
    • प्रियंका 'अलका' 14/04/2016

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