‘कविता जन्मने को है’

आज फिर आँखें नम औ दम घुटने को है,
लगता है कविता जन्मने को है.

वर्षों बीते हमें, जी भर रोये हुए,
किसी काँधें पे बेसुध सोये हुए.
अपनी पलकों पे ताला डाले हुए,
आंसुओं की माला संभाले हुए.
क्यूँ बेचैनियाँ अब दरकने को हैं,
लगता है कविता जन्मने को है.

समझे थे, पत्थर हो गए चलते-चलते,
खो गए भीड़ में, दिन ढलते-ढलते.
दर्द बूढा गया ह्रदय में पलते-पलते,
जम ही गए थे पिघलते-पिघलते.
क्यूँ पीड़ा की गागर छलकने को है,
लगता है कविता जन्मने
को है.

आज फिर आँखें नम औ दम घुटने को है,
लगता है कविता जन्मने को है.

डॉ. गीता चौहान

8 Comments

  1. योगेश कुमार 'पवित्रम' 01/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" 01/04/2016
  3. Girija 02/04/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 02/04/2016
    • Geeta Chauhan 07/04/2016

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