न सुकून के दिन हैं…

न सुकून के दिन हैं, न चैन की रातें हैं।
शेर कहकर ही अब तो हम दिल को बहलाते हैं।।

दूर होकर भी हमसे उनकी फ़ितरत नही बदली।
पैग़ाम भेजकर आज भी वो मुझको आज़माते हैं।।

दस्तक भी नही दी जिसने कभी मेरे दरवाज़े पे।
ख़यालों में ख्वामखां ही वो क्यूँ चले आते हैं।।

दीदार होता है जब भी कभी उनकी हसीं तस्वीर का।
न जाने क्यूँ दिल में फिर अरमान मचल जाते हैं।।

— अमिताभ ‘आलेख’

10 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 30/03/2016
    • आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016
    • आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016
  2. Abha.ece 30/03/2016
    • आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016
  3. Shishir "Madhukar" 31/03/2016
    • आमिताभ 'आलेख' 31/03/2016
  4. babucm 05/04/2016
    • आमिताभ 'आलेख' 07/04/2016

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