प्रभु तेरी लीला

हे प्रभु तेरी लीला भी अपरंपार है
कहीं तेरी कृपा की एक बूंद भी नहीं
कहीं तेरी कृपा की भारी बरसात है
कहीं रोटियों को तरसती आँखें है
कहीं पिज़्ज़ा से उक्ताती आंखे है
कहीं झोपड़ी को तरसते आदमी है
कहीं आदमी को निहारते मकान हैं
कहीं वस्त्र बिन मानवता बड़ी मजबूर है
कहीं किसीको अपने वस्त्रों पर गुरूर है

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 25/03/2016
    • BARGLA 28/03/2016
  2. निवातियाँ डी. के. 26/03/2016
  3. BARGLA 28/03/2016

Leave a Reply