एक दास्ताँ मेरी कलम ने लिखी

एक दास्ताँ मेरी कलम ने लिखी….
कभी थोड़ी रुकी कभी स्याही थोड़ी फीकी पड़ी ….
गुज़ारी रात मैंने चौदहवीं रात के चाँद तले…..
सितारे भी मदमस्त थे अपने आशियानों में…
चांदनी लगी हुई थी रूठे चाँद को मनाने में…
मेरा कारवाँ लगा था आराम फरमाने में …
मैं और मेरी कलम मसगूल थे इन मंज़रों को
अपने जीवन के पन्नों पर कैद करने में….
अचानक देखते ही देखते सन्नाटों की धूल भरी आंधी आई ….
उदासी की काली घटा छा गयी….
चाँद भी जा छुपा उन बादलों के पीछे ….
सितारों ने आशियानों की खिड़ियां ही बंद कर दी ….
कारवाँ के सब लोग लगे पड़े थे अपने आप को सँभालने में…
मैं और मेरी कलम दोनों बेचारे व्यस्त थे दूसरों के लिए
उन मंज़रों को पन्नों पर कैद करने में ……!!!
चरमराता शाख भी टुटा …..
कितनों का अरमान भी फूटा ….
रिमझिम बरसात ने कब भयानक रूप लिया कुछ पता न चला …..
गल गए अनाज रखे खेत में…..
बिखर गए खिले फूल सारे बाग में…..
जहाँ सब खुले असमान के नीचे खूबसूरत नजरिये को
आँखों की पुतलियों में कैद कर रहे थे ..
अब वहां सब अपने आप को बचाने के लिए आशियाना ढूंढ रहे थे….
पर उसी माहौल में एक दास्ताँ मेरी कलम ने लिखी……
कभी थोड़ी रुकी कभी उसकी स्याही थोड़ी फीकी पड़ी…….

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 01/03/2016
  2. Randeep Choudhary 02/03/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 02/03/2016

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